बुधवार, 27 नवंबर 2019

कज्जली के फायदे / Kajjali Benefits


कज्जली कल्प में कज्जली (Kajjali) अर्थात पारद और गंधक के सम्मिश्रण युक्त औषधियों का समावेश किया जाता है। कज्जली (Sulphuret of Mercury) शुद्ध पारद और शुद्ध गंधक समभाग लेकर, एकत्र कर 4 पहर तक इतना घोटे कि निश्चिन्द्र हो जाय अर्थात उसमें पारद की कुच्छ भी झलक न दिखाई पड़े कज्जली के समान काला वर्ण हो जाय। इसी की योजना अन्यान्य औषधियों में की जाने से कज्जली कल्प कहलाता है। कज्जली पुष्टिदायक, वीर्यवर्धक तथा विविध अनुपान योग से सर्व व्याधियों को हरण करने में समर्थ है।

आयुर्वेदिक औषधियों में कज्जली (Kajjali) को मिलाने के कारण:

1) कज्जली (Kajjali) के योग से औषधियाँ निर्विर्य नहीं होने पाती, सड़ती नहीं एवं उनपर विकारी जंतुओं का कोई असर नहीं होने पाता। उदहरणार्थ रसौत या रसाञ्जन को कुछ काल तक वैसे ही पड़ा रहने दीजिये, देखिये उसमें सड़न पैदा हो जाएगी। वही देखिये कज्जली मिश्रित रसाञ्जन युक्त प्रदरारि रस या प्रदर रिपु कितने भी दिन हो गये है, जैसे का तैसा रखा हुआ है, किंचित भी निर्विर्य नहीं हुआ है। यह कज्जली का प्रथम उपयोग है।

2) कज्जली (Kajjali) में पारद होने से वह क्षार तथा शहद के समान योगवाही है। जिन द्रव्यों के साथ उसका योग होता है उनके गुणों को बढ़ाती है। कभी-कभी उनके गुणों की वृद्धि के साथ ही अपना भी विशेष लाभदायक गुण प्रकट करती है।

3) कज्जली (Kajjali) में शामक गुण की अपेक्षा उत्तेजक गुण कुच्छ अधिक है। इस कारण कई अत्यंत शामक गुण विशिष्ट एवं ह्रदय शक्ति को कुछ कम कर देने वाली औषधियों के साथ कज्जली का उपयोग करने से उनका शामक गुण कम हो जाता है और ह्रदय को जैस चाहिये वैसा वे निर्बल नहीं कर सकती। उदाहरण: वातविध्वंसन रस में वत्सनाग है जो कि ह्रदय शक्ति का कम करनेवाला है, अधिक प्रमाण में डाला जाता है, यदि इसके साथ कज्जली का योग न हुआ होता, तो उसका ह्रदय निर्बलकारी गुण प्रबल रहता, किन्तु कज्जली के कारण वह उतना प्रबल नहीं होने पाता।

4) कज्जली में प्रमाथी गुण (अर्थात दोषपूर्ण सूक्ष्मातिसूक्ष्म स्त्रोतों के अंदर प्रविष्ट होकर, दोषों को अपने अपने रास्ते लगाना और स्त्रोतमार्ग को साफ करना) विशेष होने के कारण हम यथावश्यक औषधि का असर सूक्ष्म से सूक्ष्म स्त्रोतों के अंदर, इसके द्वारा पहुंचा सकते है।

5) आयुर्वेदिक औषधियों को शीघ्र प्रभावकारी बनाने के लिये कज्जली की योजना की जाती है। कभी कभी अत्यंत विकट प्रसंग में औषधि का शीघ्र प्रभाव न हो तो बहुत विकट स्थिति बन जाती है। इस आपत्ति को टालने के लिये कज्जली युक्त रसायन की योजना की जाती है, जिससे औषधि का शीघ्र प्रभाव पड़कर रोग को आराम किया जा सके। एक छोटा सा उदाहरण है शिरदर्द का। शिरदर्द जब होता है तो शीघ्र प्रभावकारी औषधि की जरूरत होती है, ऐसे में शिरशुलादि वज्र रस अपना शीघ्र प्रभाव दिखाता है। विलायती औषध पेरासिटामोल से भी शीघ्र शिर दर्द को नष्ट कर देता है।

6कज्जली वाली औषधि कम मात्रा में भी अपना योग्य प्रभाव दिखाती है। जिससे दवा की मात्रा कम की जा सकती है। दवा की मात्रा कम हो जाने से उसका अनिष्ट परिणाम भी नहीं होता।

7) जंतुघ्न, वृष्य (पौष्टिक) और उत्तेजक गुण कज्जली (Kajjali) में मुख्य होते है। जिससे शरीर में जंतुओं का विनाश होता है और शरीर को पोषण भी मिलता है और शरीर के ह्रदय आदि अंगो को उत्तेजना भी मिलती है।

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